-->

coronavirus status

चुनाव की वजह से बिहार फिर केंद्र में है, इतिहास के गर्भ में दबा तथ्य है कि ‘आधुनिक बिहार’ बना कैसे? जवाब एक किताब में मिला

चुनाव की वजह से बिहार फिर केंद्र में है, इतिहास के गर्भ में दबा तथ्य है कि ‘आधुनिक बिहार’ बना कैसे? जवाब एक किताब में मिला

बिहार फिर केंद्र में है। चुनावी वजह से। इतिहास के गर्भ में दबा तथ्य है कि ‘आधुनिक बिहार’ बना कैसे? दशकों से तलाश थी, इस पुस्तक की। ‘सम इमिनेंट बिहार (तब ‘BEHAR’ लिखते थे) कंटेंपररीज’। 1944 में हिमालय पब्लिकेशन ने इसे छापा।

लेखक हैं, डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा (10 नवंबर 1871-06 मार्च 1950)। प्रसिद्ध सांसद, शिक्षाविद, पत्रकार तथा संविधान सभा के पहले अध्यक्ष। पुस्तक में उन्होंने 20 समकालीन बिहारी लोगों पर शब्द चित्र लिखा है। पुस्तक की भूमिका लिखी है, लीजेंड बन चुके अमरनाथ झा ने।

पुस्तक की भूमिका में, 1893-1943 का विवरण है। लिखा है कि पिछली सदी में मुझे अपमानजनक लगा कि ‘बिहार’ शब्द, ब्रिटेनवासी जानते ही नहीं थे। तब ब्रिटेन में एक गोष्ठी में कुछ भारतीयों ने उन्हें चुनौती दी कि भूगोल के पाठ्यपुस्तक में बिहार बताएं? वे कहते हैं, ‘तब मुझे लगा, हम बिना पहचान के लोग हैं। 1893 में बिहार लौटा एक बिहारी पुलिस ड्रेस में दिखा। ड्रेस पर दूसरे राज्य का बिल्ला था। यह देख दु:ख हुआ।

तय किया कि बिहार की पहचान के लिए काम करना है।’ 1893 में बिहार का कोई ‘जरनल’ नहीं था, जिसका संपादन बिहारी करता हो। उन्होंने पटना में प्रैक्टिस शुरू की। जनवरी 1894 में पहला पत्र निकला ‘BEHAR TIMES’। डॉ सिन्हा मानते हैं, यह बिहार के पुनर्जागरण का दिन था। जुलाई 1907 में इसका नाम ‘बिहारी’ पड़ा। बिहारी भावना का यह प्रतीक बन गया।

डॉ सिन्हा कहते हैं, इसका श्रेय संपादक महेश नारायण को था। उनकी समझ अद्भुत थी। 1907 में अचानक उनका निधन हुआ। बंगाल के गवर्नर (लेफ्टिनेंट गवर्नर एलेक्जेंडर मैगजीन) गया आए। उन्होंने अलग बिहार की मांग को असंभव बताया। इससे आंदोलन लगभग खत्म हो गया। डॉ सिन्हा की भाषा में, विरोधी कहने लगे, सिर्फ ‘चार दरवेश’ (चार भिखारी) बच गए। डॉ. सिन्हा, महेश नारायण, नंदकिशोर लाल, राय बहादुर कृष्णा सहाय।

सात वर्षों तक यह आंदोलन ठहर गया। पर यह समूह, चुपचाप जनमत बनाने में लगा रहा। 1905 में बंगाल विभाजन हुआ। समूह को लगा, यह निर्णायक क्षण है। 1906 में सर एन्डू फ्रेजर नए विभाजित बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर बने। बिहार में फ्रेजर लोकप्रिय हुए। बिहारियों ने फ्रेजर मेमोरियल ट्रस्ट बनाया। 1908 में ही मजहरूल हक (गांधीजी के मित्र) प्रैक्टिस के लिए बिहार लौटे। पटना बार के अली इमाम और हसन इमाम, उभरते नेतृत्व थे।

डॉ सिन्हा ने इनसे संपर्क किया। 1908 में पहला बिहार प्रांतीय सम्मेलन हुआ। अली इमाम की सदारत में। इसमें बंगाल से बिहार को अलग प्रांत बनाने का प्रस्ताव पास हुआ। पांच वर्ष बाद यह हकीकत था।
1907 में कोलकाता हाईकोर्ट के पहले बिहारी जज बने सरफुद्दीन। 1908 में अली इमाम, भारत सरकार के ‘स्टैंडिंग काउंसिल’ बने।

मार्ले मिंटो सुधार के तहत 1910 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए डॉ सिन्हा चुने गए। इस तरह बिहारियों को पद मिलने लगे। 1910 में डॉ सिन्हा को लॉर्ड मिंटो ने बुलाया। चर्चा का विषय था, भारत सरकार के तत्कालीन लॉ मेंबर लॉर्ड एसपी सिन्हा पद छोड़ना चाहते थे।

डॉ सिन्हा ने बिहारी, अली इमाम का नाम बढ़ाया। लॉर्ड मिंटो की शर्त थी कि लॉर्ड सिन्हा, अली इमाम को पत्र लिखें। पर, लॉर्ड मिंटो व लॉर्ड एसपी सिन्हा, आशंकित थे कि वे पद संभालेंगे! कारण, स्टैंडिंग काउंसिल के रूप में उनकी आमद बहुत थी।

डॉक्टर सिन्हा बताते हैं, अली इमाम बिल्कुल तैयार नहीं थे। अंततः उन्हें इस तर्क ने प्रभावित किया कि उस पद पर होने से, बिहार एक अलग पहचान पा सकेगा। नवंबर 1910 में, अली इमाम को ब्रिटेन के सम्राट ने लॉ मेंबर घोषित किया। पूरे बिहार में उत्सव हुआ। डॉ सिन्हा कहते हैं, 1911 के बसंत में, काउंसिल बैठक के लिए शिमला में था। ब्रिटेन के सम्राट ने, दिल्ली को दरबार के लिए चुना।

एक दिन मोहम्मद अली मिलने आए। सुझाव दिया कि ब्रिटिश भारत की स्थाई राजधानी, दिल्ली बनाने का यही क्षण है। उसी क्षण डॉ सिन्हा ने अली इमाम से कहा कि आपके लॉ मेंबर रहते, बिहारियों को ब्रिटिश साम्राज्य से बड़ी पहचान मिलनी चाहिए। अलग प्रांत के रूप में। इमाम साहब का जवाब था, सपना देखते रहिए।

डॉ सिन्हा ने ‘लेफ्टिनेंट गवर्नर इन काउंसिल’ का सुझाव दिया। इस पर गवर्नर जनरल और उनके एग्जिक्यूटिव काउंसिल में चर्चा होती रही। फिर इतिहास का यादगार पल आया। 12 दिसंबर 1911 को ब्रिटेन के सम्राट ने दिल्ली दरबार में ‘लेफ्टिनेंट गवर्नर इन काउंसिल’ की घोषणा की। बिहार व उड़ीसा गठन के लिए। पर, दरबार में किसी को एहसास नहीं हुआ।

चंद रोज बाद नई दिल्ली में ब्रिटेन के सम्राट, एक संस्था की नींव रखने वाले थे। वहां डॉ सिन्हा भी थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के मानिंद जज, सर प्रमदा चरण बनर्जी ने उनको बधाई दी। आपको राज्य मिला। डॉ सिन्हा ने कहा, धन्यवाद, साथ ही एग्जिक्यूटिव काउंसिल भी मिला है। उन्होंने कहा, असंभव। डॉ सिन्हा ने सम्राट की घोषणा का कानूनी अर्थ बताया। इस तरह बिहार अलग बना। डॉ सिन्हा लिखते हैं कि गवर्नर जनरल की एग्जिक्यूटिव काउंसिल में बिहारी सर अली इमाम की मौजूदगी नहीं होती, तो पता नहीं क्या आकार होता? इस तरह आधुनिक बिहार के निर्माता बने डॉ सच्चिदानंद सिन्हा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें
हरिवंश, राज्यसभा के उपसभापति।


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/3j0AeYP
via LATEST SARKRI JOBS

0 Response to "चुनाव की वजह से बिहार फिर केंद्र में है, इतिहास के गर्भ में दबा तथ्य है कि ‘आधुनिक बिहार’ बना कैसे? जवाब एक किताब में मिला"

Post a comment

coronavirus

Iklan Atas Artikel

Iklan Tengah Artikel 1

Iklan Tengah Artikel 2

Iklan Bawah Artikel