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22 सालों में बिहार में 8 बार साथ, 4 बार अलग लड़े, लेकिन चुनाव बाद हमेशा साथ ही रहे

22 सालों में बिहार में 8 बार साथ, 4 बार अलग लड़े, लेकिन चुनाव बाद हमेशा साथ ही रहे

बिहार में नई सरकार का गठन हो गया है। नीतीश कुमार लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं। इधर, महागठबंधन में कांग्रेस और राजद के बीच मतभेद सामने आने लगे हैं। राजद नेता शिवानंद तिवारी ने कांग्रेस की टॉप लीडरशिप पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि गठबंधन के लिए कांग्रेस बाधा की तरह रही। चुनाव के वक्त राहुल गांधी पिकनिक मना रहे थे। कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन 70 रैलियां भी नहीं कीं। तिवारी ने कहा कि क्या कोई पार्टी ऐसे चलाई जाती है? पीएम नरेंद्र मोदी राहुल गांधी से ज्यादा उम्रदराज हैं, लेकिन उन्होंने राहुल से ज्यादा रैलियां कीं। राहुल ने केवल 3 रैलियां क्यों कीं?

दरअसल, इस बार के चुनाव में राजद तेजस्वी के ताजपोशी की तैयारी कर रही थी। भास्कर को छोड़ दें तो तमाम एग्जिट पोल भी उसी के फेवर में थे, लेकिन जब रिजल्ट डिक्लेयर हुआ तो महागठबंधन बहुमत से चंद कदम दूर रह गया। और अब इसका ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ा जा रहा है। आगे इसका असर गठबंधन पर होगा या नहीं ये तो वक्त बताएगा, लेकिन बिहार में कांग्रेस और राजद के बीच गठबंधन का ये खेल कोई नया नहीं है। जब से राजद की एंट्री हुई, तब से दोनों के बीच मिलने बिछुड़ने का दौर चलता रहा है।

दोनों के गठबंधन को समझने के लिए हमें 31 साल पहले जाना होगा। 1989 के अंत में भागलपुर में दंगा हुआ। सैकड़ों जानें गईं। तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। लालू यादव ने मुस्लिम कार्ड खेला और दंगों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद 1990 में विधानसभा चुनाव हुआ। कांग्रेस यह चुनाव हार गई। जनता पार्टी, जो नई- नई बनी थी उसे बहुमत मिला और मुख्यमंत्री बने लालू यादव। सीएम बनते ही लालू ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया। इस तरह बिहार की राजनीति में एक नए समीकरण MY( मुस्लिम और यादव) की एंट्री हुई और यहीं से बिहार में कांग्रेस के पतन का दौर शुरू हुआ।

कांग्रेस इस कदर कमजोर हो गई कि अब उसे बिहार में राजनीति करने के लिए सहारे की जरूरत पड़ने लगी। 1995 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन और भी खराब हुआ। 324 सीटों में से उसे महज 29 सीटें मिलीं। जबकि, 167 सीटें जीतने वाली जनता पार्टी की तरफ से लालू फिर से सीएम बने। इसके बाद लालू यादव चारा घोटाले में फंस गए। जनता दल ने उनसे अलग हो गई और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल(RJD) का जन्म हुआ। इसके बाद 1998 में लोकसभा का चुनाव हुआ। कांग्रेस बिहार में कमजोर हो गई थी, उसने मजबूती के लिए लालू से हाथ मिला लिया। 1998 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस और RJD ने मिलकर लड़ा। यह दोनों का पहला गठबंधन था।

54 सीटों में लालू ने केवल 8 सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ी। कांग्रेस को चार पर जीत मिली।1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 13 सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें से 8 पर RJD से समझौते के तहत और 5 पर फ्रेंडली लड़ाई हुई, लेकिन जीत मिली सिर्फ 2 पर। कांग्रेस को लगा कि राजद के साथ उसका गठबंधन फायदे का सौदा नहीं है तो अगले साल यानी 2000 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने अकेले लड़ने का फैसला किया। कांग्रेस ने कहा कि लालू यादव भ्रष्ट हैं, उन पर घोटाले का आरोप है। वही लालू यादव जिनके साथ कांग्रेस ने चारा घोटाले का आरोप लगने के बावजूद 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं। उधर लालू की पार्टी भी बहुमत से दूर रह गई। जोड़- तोड़ की राजनीति शुरू हुई, नीतीश कुमार सात दिनों के लिए सीएम बने, लेकिन कांग्रेस ने राजद को समर्थन दे दिया और राबड़ी देवी बिहार की सीएम बनीं।

2004 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने राजद के साथ लड़ा। इस बार रामविलास पासवान के रूप में एक और नए साथी की गठबंधन में एंट्री हुई थी। इस चुनाव में कांग्रेस को 4 सीटें मिलीं। केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी और लालू-रामविलास मंत्री बने। इसके बाद फरवरी 2005 में विधानसभा का चुनाव हुआ। कांग्रेस फिर से राजद से अलग हो गई और लोजपा के साथ मैदान में उतरी। इस बार किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। सत्ता की चाबी राम विलास के पास रह गई, लेकिन ताला नहीं खुला और इस तरह राष्ट्रपति शासन लग गया।

अक्टूबर 2005 में बिहार में फिर से चुनाव हुआ। इस बार राजद और कांग्रेस में फिर से मिलन हो गया। इस चुनाव में 9 सीटें कांग्रेस मिलीं और गठबंधन बहुमत से दूर रह गया। राज्य में NDA की सरकार बनी और नीतीश कुमार नए सीएम। इसके बाद लोकसभा के तीन और विधानसभा के भी तीन चुनाव हुए। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को राजद और लोजपा ने केवल 4 सीटें दीं। कांग्रेस ने उसे लेने से इनकार कर दिया और अपने दम पर चुनाव लड़ा। हालांकि, इसका फायदा उसे नहीं हुआ और सिर्फ दो सीटें ही जीत सकी।

अगले साल यानी 2010 में विधानसभा का चुनाव हुआ। कांग्रेस फिर से अकेले मैदान में उतरी। इस बार उसे सबसे कम यानी सिर्फ 4 सीटें ही हासिल हुईं। कांग्रेस अब लगने लगा कि राजद के बिना बिहार में उसकी दाल गलने नहीं वाली है। 2014 के लोकसभा में वह फिर से राजद के साथ आ गई। इस बार मोदी की लहर थी। लिहाजा, कांग्रेस और राजद दोनों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा। कांग्रेस 12 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। उसे दो सीटों पर जीत हासिल हुई, जबकि 27 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले राजद को चार सीटें मिलीं।

2015 में फिर से कांग्रेस और राजद साथ मिलकर लड़े। इस बार नीतीश कुमार के रूप में इन्हें नया साथी मिला। कांग्रेस के लिए इस चुनाव ने टॉनिक की तरह काम किया। जो पार्टी बिहार में खत्म सी हो रही थी, उसे थोड़ी जान मिल गई। इस चुनाव में कांग्रेस 41 सीटों पर लड़ी और उसे 27 पर जीत मिली। सीटों की संख्या और स्ट्राइक रेट के हिसाब से 1995 के बाद कांग्रेस का सबसे बेहतर प्रदर्शन था। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी राजद और कांग्रेस साथ लड़ी। जहां कांग्रेस को सिर्फ एक सीट तो राजद का खाता तक नहीं खुला।



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2020 के विधानसभा चुनाव में राजद को 75 सीटें मिली हैं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 19 सीटें हासिल हुई हैं।


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