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वो बाजार, जहां के दीयों से विदेशों में होती है रोशनी; पर इस बार ग्राहकी आधी

वो बाजार, जहां के दीयों से विदेशों में होती है रोशनी; पर इस बार ग्राहकी आधी

एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में आता है कुंभरवाड़ा। कुंभर यानी कुम्हार और वाड़ा यानी कॉलोनी। इस तरह कुम्हारों की बसाहट के बाद कुंभरवाड़ा बना। 100 साल से भी ज्यादा समय से यहां मिट्टी के बर्तन बनाने का काम चल रहा है। कुंभरवाड़ा दीयों का कितना बड़ा मार्केट है, इसका अंदाज इस बात से लगा सकते हैं कि सालभर में यहां करीब 10 करोड़ दीये बनाए जाते हैं। यहां घरों के बाहर भट्टी और घरों के अंदर मिट्टी के बर्तन सजे होते हैं।

दिवाली इन लोगों के लिए बिजनेस का सबसे बड़ा मौका होता है, लेकिन इस बार हालात खराब हैं। कोरोना के चलते न माल एक्सपोर्ट हुआ है और न ही लोकल ग्राहकी अच्छी हो रही है। कोरोना ने इस पॉटरी विलेज की दीपावली फीकी कर दी है।

कुंभरवाड़ा मुंबई का मिट्टी के बर्तनों का सबसे बड़ा बाजार है।

5 हजार दीये खराब हो गए, बिके अभी तक 10 हजार ही

राकेश भाई 90 फीट रोड पर ही मिट्टी के बर्तनों की दुकान लगाते हैं। कहते हैं, 'पहली बार ऐसा हो रहा है कि हमें भट्टी जलाने के लिए वेस्ट मटेरियल भी महंगा मिल रहा है और माल भी नहीं बिक रहा। वेस्ट मटेरियल महंगा क्यों हो गया? इस पर बोले, 'भैया धारावी में कपड़े की हजारों फैक्ट्रियां हैं। उनकी जो बची हुई कतरन होती है, वही हम खरीदते हैं और उससे भट्टी जलाते हैं। इस बार फैक्ट्रियां ही बंद पड़ी थीं। चुनिंदा फैक्ट्रियों ने ही कतरन बेची तो जो माल 80 रुपए में मिलता था वो 220 में मिला।'

राकेश ने दीपावली के लिए 20 हजार दीये रखे थे। इसमें से 5 हजार तो खराब ही हो गए, क्योंकि वो काली मिट्टी से बने थे। गुजरात से जो मिट्टी आती है, वो आ नहीं पाई थी। ऐसे में काली मिट्टी से दीये बनाने पड़े। 15 हजार दीये बचे थे, उसमें से करीब 10 हजार ही बिक पाए हैं। पिछली दिवाली तक तो एक झटके में ही इतना माल निकल जाता था। कहते हैं कि कुछ दिनों पहले मेरे पिताजी की डेथ हुई है। हमें मिठाई, कपड़े कुछ नहीं खरीदना। खरीदना होता तो इस बार कुछ खरीद भी नहीं पाते।

कुंभरवाड़ा के राकेश कहते हैं कि पिछली दिवाली तक तो इतनी भीड़ होती थी कि खाने का भी टाइम नहीं मिल पाता था, अब तो सब मंदा है।

दरअसल, कुंभरवाड़ा के कुम्हार हर साल मार्च-अप्रैल से दीये बनाना शुरू कर देते हैं। यह काम अक्टूबर तक चलता है, फिर दीपावली पर ग्राहकी होती है। छोटे लेवल पर काम करने वाले भी दिवाली पर लाख-दो लाख कमा लेते हैं। यह कमाई चार-पांच महीने की मेहनत की होती है। इस बार कोरोना के चलते मार्च-अप्रैल में कोई काम हो ही नहीं सका। दीयों के लिए मिट्टी गुजरात से आती है, वो भी इस बार नहीं आई। जून के बाद कुछ गाड़ियां आईं, लेकिन माल इतना महंगा बिका कि छोटे लेवल पर काम करने वाले खरीद नहीं सके। अब ये लोग वो माल बेच रहे हैं, जो पहले से बना रखा हुआ है।

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पीढ़ियों से यही काम कर रहे, इस बार ग्राहकी आधी हो गई

हंसमुख भाई परमार कहते हैं, 'हम पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं। कुंभरवाड़ा में तैयार होने वाले दीये यूएस, दुबई और लंदन तक जाते हैं। कुछ माल पानी के जहाज से जाता है तो कुछ हवाई जहाज से जाता है। हालांकि, बाहर माल भेजने का काम कुछ बड़े लोग ही करते हैं। छोटे व्यापारी तो यहीं के भरोसे होते हैं। मुंबई में अभी लोकल सभी के लिए शुरू नहीं हुई इसलिए शहर के ग्राहक भी इधर नहीं आ रहे।'

वो कहते हैं कि बेरोजगारी और कामधंधा मंदा होने के कारण भी लोग परेशान हैं इसलिए दीपावली पर बहुत ज्यादा खरीदारी नहीं कर रहे। हंसमुख भाई ने पिछले 20 सालों में पहली बार दिवाली पर इतनी फीकी ग्राहकी देखी है। कहने लगे कि बिजनेस सीधे-सीधे 50 टका कम हो गया। पहले दिवाली पर 4 से 5 लाख रुपए का बिजनेस होता था, इस बार तो लाख में बात पहुंची ही नहीं।

हसमुख कहते हैं कि पिछले 20 सालों में पहली बार दीपावली पर इतना मंदा बाजार देखा है।

50 लाख दीये विदेश जाते हैं
कुंभरवाडा में मिट्टी के बर्तनों का छोटे लेवल पर बिजनेस करने वाला कुम्हार परिवार भी सालभर में औसतन 1 लाख दीये बनाता है। इससे महीने में 15 से 20 हजार रुपए की कमाई हो जाती है। सालभर में करीब 10 करोड़ दीये बनते हैं। कारोबारियों के मुताबिक, 50 लाख दीये तो विदेशों में एक्सपोर्ट हो जाते हैं। दीये के साथ ही मिट्टी के कई आइटम यहां बनाए जाते हैं।

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कुंभरवाड़ा में ढेरों छोटे-छोटे कारोबारी हैं, जिनके लिए दीवाली कमाने का बड़ा मौका होता है। पूरा परिवार इस काम में लग जाता है, लेकिन इस बार सब मंदा है।


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